129. जीना कोई हंसी खेल नहीं
Nazim Hikmet (January 17, 1902 – June 3, 1963) was a Turkish poet and best known as a romantic revolutionary. His works were banned in Turkey from 1938 to 1965 because of his political views.
Read here one of my favorite poem Jeene Ke Bare Me (About Living), that’s a lengthy poem -
जीना कोई हंसी खेल नहीं:
आपको जीना चाहिये
बड़ी संजीदगी के साथ
मसलन, किसी गिलहरी की तरह –
मेरा मतलब है
जीवन से सुदूर और ऊपर की किसी
चीज की तलाश किये बगैर,
मेरा मतलब है ज़िंदा रहना
आपका मुकम्मिल काम होना चाहिये ।
जीना कोई हंसी खेल नहीं:
आपको इसे गंभीरता से लेना चाहिए,
ऐसी और इस हद तक
कि, मिसाल के तौर पर,
आपके हाथ बंधे आपकी पीठ पर,
आपकी पीठ दीवाल पर
या फिर किसी प्रयोगशाला में
अपने सफेद कोट और हिफाज़ती चश्मों में
आप मर सके लोगों के लिये -
उन लोगों तक के लिये,
जिनके चेहरे भी आपने कभी नहीं देखे
गो कि जानते हैं आप
कि जीवन सबसे ज्यादा
वास्तविक, सबसे सुन्दर चीज है।
मेरा मतलब है,
आपको इतनी संजीदगी से लेना चाहिये
जीवन को
कि, उदाहरण के लिये, सत्तर की उम्र में भी
आप रोपें जैतून का पौधा
और यह नहीं कि अपने बच्चों के लिये,
बल्कि इसलिये कि हालांकि
आप मृत्यु से डरते हैं
पर उस पर विश्वास नहीं करते
क्योंकि जीवन,
मेरा मतलब है, ज्यादा वजनदार चीज़ है।
(II)
मान लीजिये हम बहुत बीमार है
- ऑपरेशन की जरूरत है -
जिसका मतलब है कि
हो सकता है हम उठ भी न सके
उस सफेद मेज़ से ।
गो कि यह असंभव है,
अफसोस महसूस न करना
थोड़ा जल्दी ही चले जाने के बारे में
हम फिर भी हंसेंगे चुटकुले सुनते हुये,
हम देखेंगे खिड़की के बाहर
कि बारिश तो नहीं हो रही,
या चिंताकुल प्रतीक्षा करेंगे
ताज़ा समाचार प्रसारण की
मान लीजिये हम मोर्चे पर हैं-
लड़ने लायक किसी चीज़ के लिये।
वहां, पहले ही हमले में, उसी दिन
हम औध गिर सकते हैं मुंह के बल मुर्दा।
हम जानते होगे इसे एक
अजीब गुस्से के साथ,
फिर भी हम सोचते सोचते
हलाकान कर लेंगे खुद को
उस युद्ध के नतीजे की बाबत
जो बरसों चल सकता है।
मान लीजिये हम जेल में है
और पचास की उम्र की लपेट में,
और लगाइये, कि अभी अट्ठारह बरस बाकी है
लौह फाटकों के खुलने में।
हम फिर भी जियेंगे बाहर की दुनियां के साथ,
इसके लोगों, पशुओं, संघषों और हवा के –
मेरा मतलब कि
दीवारों के पार की दुनिया के साथ।
मेरा मतलब, कैसे भी कहीं भी हो हम
हमें यों जीना चाहिये
जैसे हम कभी मरेंगे ही नहीं।
(III)
यह धरती ठंडी हो जायेगी एक दिन,
सितारों में एक सितारा ऊपर से सबसे नन्हा,
नीले मखमल पर एक सुनहली ज़र्रा-
मेरा मतलब है यही हमारी महान पृथ्वी
यह पृथ्वी ठण्डी हो जायेगी एक दिन,
बर्फ की सिल्ली की तरह नहीं
मुर्दा बादल की तरह भी नहीं
बल्कि एक खोखले अखरोट की तरह
यह लुढ़कती होगी, घनघोर काले शून्य में
अभी इसी वक्त
आपको इसका दुः ख मनाना चाहिये –
अभी, इसी वक्त, ज़रूरी है आपके लिये यह
अफसोस महसूस करना -
क्योंकि दुनियां को इतना ही प्यार करना ज़रूरी है
अगर आपको कहना है "मैं जिया।"
- नाज़िम हिकमत
(Translated By Viren Dangwal, Hindi poet)