114. निमंत्रण
हे मेरे मूक निमंत्रण प्रिय !
मुझको गुलाल से नहला दो
चांदनी रातों में छन-छनकर
रश्मियां आती हैं, जब पथ पर
एक आलोक बसा करता है,
तुम पर, सांय-सांय के सरगम पर;
उस क्षणिक, दीपमय, सुंदरतम
अजनबी बनें, जब हम तत्क्षण,
बह जाती अगाध नीरवता
हमको ले-लेकर अपने संग;
उस ज्योत्स्ना में डूबी प्रिय !
राहों से मुझे मिला दो
हे मेरे मूक निमंत्रण प्रिय !
मुझको गुलाल से नहला दो
रूपसि ! के रूप सदा प्यारे,
मैंने अनजाने स्पर्श किया;
महकी गंधी सी सोया था,
मस्तक उनका किल्लोल किया
आवाज कहां से आई, ईश्वर
जाने, मुख से या मन से,
भयवश ही हाथ विछल पड़े,
मुझको अब प्रिये! सजा दो
हे मेरे मूक निमंत्रण प्रिय !
मुझको गुलाल से नहला दो
तीव्र श्वासों पर फिसलता
हस्त-मुख मेरे प्रिया के
उस वदन पर, आज मधुरिम दे रहा
संगीत सा, मेरे हृदय को;
रक्तिम अधरों से अधर मिले,
फिर नया सोमरस छलका,
श्वासों का वेग रूका फिर
इतना ही बस रहने दो
हे मेरे मूक निमंत्रण प्रिय !
मुझको गुलाल से नहला दो
हे गहन ! न देखा होगा,
तुमने भी ऐसे केश-पाश;
लहराते से, इठलाते से,
मोदक, मोहक, मुक्ताजाल
कुदरत को दिये बधाई !
शशिमुख पर शीश झुकाकर
रक्तिम अधरों पर सुरा मिला,
फिर सुर का अब, तुम नाम न लो
हे मेरे मूक निमंत्रण प्रिय !
मुझको गुलाल से नहला दो
मानस पर लिखी हुई है,
आंखों की कही कहानी।
अंधियारा ही अंधियारा है,
कैसे में पहुं जवानी ?
प्रिय तर शुत्र धवल किम
अपरों पर, दीप जले हैं जी,
उनके उजियारे में आली।
मुझको कागर पढ़ने दी
हे मेरे मूक निमंत्रण प्रिय।
मुझको गुलाल से नहला दो
मूक मिलन होने से क्या,
आंखों ने बात किया, फिर भी,
मत पछताओ आंखें प्यासी,
मानस को मजा नहीं आया
हे प्रिया। देख लूं क्षण भर,
फिर मैं राह चला जाऊंगा;
मानस है तेरे पास मेरा
राहों से मुझे मिला दो
हे मेरे मूक निमंत्रण प्रिय ।
मुझको गुलाल से नहला दो
(13 मई, 1977)
(कल्पना की सीढ़ियों से)