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November 08, 2025

100. हार नहीं मानी

अपने से हारा हूं कई बार 

पर दुनिया से हार नहीं मानी 

हर बार ऊंची कर ली है गरदन 

जब भी सिर तक चढ़ आने को 

उतावला दिखा है

झंझटों, 

विपत्तियों, 

संकटों का खौलता पानी

 

अपराजेय

जिजीविषा से भरा मन 

कैसे स्वीकार करे 

समय का कठोर वसन

 

हम चलेंगे

फिर चलेंगे

 

गिरेंगे

गिरकर उठेंगे

 

बजा देंगे एक दिन 

जीवन समर के मंदिर में वह दूर लटकी

हिल रही घंटी

 

(कल्पना की सीढ़ियों से)